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002 सुतीक्ष्ण का अगस्त्य ऋषि से प्रश्न

1 जनवरी

उभाभ्याम् एव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणः गतिः तथैव ज्ञान कर्माभ्यां जायते परमं पदम् (7)

सुतीक्ष्ण ने अगस्त ऋषि से पूछा: हे ऋषि, मुझे मोक्ष के संबंध में जानकारी दें और बताएँ कि कर्म और ज्ञान में से कौन मोक्ष की प्राप्ति में सहायक है।

अगस्त्य ऋषि ने उत्तर दियाः जिस प्रकार पक्षी अपने दोनों परों से उड़ते हैं, उसी प्रकार मोक्ष की प्राप्ति में कर्म और ज्ञान दोनों सहायक होते हैं। न अकेले कर्म ही मोक्ष की प्राप्ति में सहायक हो सकता है और न अकेले ज्ञान ही। सुनो! तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। कारुण्य नामक एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति था। उसके पिता का नाम अग्निवेश्य था। धर्मग्रंथों के अध्ययन तथा मनन के फलस्वरूप कारुण्य जीवन के प्रति उदासीन हो गया था। अग्निवेश्य ने एक दिन अपने पुत्र से पूछा कि तुमने अपना नित्य नियम क्यों छोड़ दिया है। उत्तर में कारुण्य ने कहा, “हमारे धर्मग्रंथ एक बात तो यह कहते हैं कि शास्त्रों में उल्लिखित सभी कर्म करने चाहिए और साथ ही यह भी कहते हैं कि अमर पद प्राप्त करने के लिए सभी कर्मों का त्याग कर देना चाहिए। मेरे पिताजी! मेरे गुरुवर! मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर मैं क्या करूँ?” इतना कहकर कारुण्य चुप हो गया।

अग्निवेश्य ने उत्तर दियाः

मेरे बेटे, ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ। उसके निष्कर्ष पर विचार करो और फिर जैसा तुम समझो वैसा करो। एक समय की बात है कि सुरुचि नामक अप्सरा हिमालय की एक चोटी पर बैठी थी। उसने देवताओं के राजा इंद्र के दूत को अपनी ओर आते हुए देखा। सुरुचि के पूछने पर उसने अपने आने का प्रयोजन बतलाया। उसने कहा कि राजर्षि अरिष्टनेमि ने अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया है और अब वे गंधमादन पर्वत पर घोर तपस्या में लगे हुए हैं। यह देखकर इंद्र ने मुझसे कहा कि अप्सराओं का झुंड लेकर जाओ और उन्हें स्वर्ग में ले आओ। उत्तर में मैंने कहा कि पुण्य आत्माओं को पुरस्कृत करने के लिए स्वर्ग उपयुक्त स्थल नहीं, क्योंकि पुण्य कर्मों के क्षीण होने पर उन्हें फिर मृत्युलोक में जाना पड़ता है। उन राजर्षि ने भी इंद्र का निमंत्रण अस्वीकार कर दिया और स्वर्ग जाने से भी इन्कार कर दिया। इंद्र ने मुझे पुनः राजर्षि के पास यह कहने के लिए भेजा है कि वे मेरा निमंत्रण ठुकराने से पहले महर्षि वाल्मीकि से परामर्श अवश्य कर लें।

राजर्षि का परिचय फिर महर्षि वाल्मीकि से हुआ। उन्होंने वाल्मीकि से पूछा, “जन्म-मरण के चक्कर से बच निकलने का उपाय क्या है?” उत्तर में वाल्मीकि ने राम और वसिष्ठ में हुई वार्ता का वर्णन किया।

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